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शल्य पर्व
अध्याय २२
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सञ्जय़ उवाच
मत्ता रुधिरगन्धेन वहवोऽत्र विचेतसः |  ७३   क
जघ्नुः परान्स्वकांश्चैव प्राप्तान्प्राप्ताननन्तरान् ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति