द्रोण पर्व  अध्याय २२

सञ्जय़ उवाच

एकवर्णेन सर्वेण ध्वजेन कवचेन च |  ५५   क
धनुषा रथवाहैश्च नीलैर्नीलोऽभ्यवर्तत ||  ५५   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति