वन पर्व  अध्याय २२

वासुदेव उवाच

न तस्योरसि नो मूर्ध्नि न काय़े न भुजद्वय़े |  ७   क
अन्तरं पाण्डवश्रेष्ठ पश्यामि नहतं शरैः ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति