वन पर्व  अध्याय २२

वासुदेव उवाच

तानाशुगैरापततोऽहमाशु; निवार्य तूर्णं खगमान्ख एव |  ३   क
द्विधा त्रिधा चाच्छिनमाशु मुक्तै; स्ततोऽन्तरिक्षे निनदो वभूव ||  ३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति