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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
एवङ्गते तु किं शक्यं मय़ा कर्तुमरिन्दम |  १३   क
मम दोषोऽय़मत्यर्थं ख्यापितो यन्न सूर्यजः |  १३   ख
तन्निमित्तं महावाहो दानं दद्यास्त्वमुत्तमम् ||  १३   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति