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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय २२
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वैशम्पाय़न उवाच
आय़सं हृदय़ं नूनं मन्दाय़ा मम पुत्रक |  १२   क
यत्सूर्यजमपश्यन्त्याः शतधा न विदीर्यते ||  १२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति