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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
इत्येष ते ग्रहोद्देशो मानुषाणां प्रकीर्तितः |  ५८   क
न स्पृशन्ति ग्रहा भक्तान्नरान्देवं महेश्वरम् ||  ५८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति