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वन पर्व
अध्याय २१९
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मार्कण्डेय़ उवाच
यः पश्यति नरो देवाञ्जाग्रद्वा शय़ितोऽपि वा |  ४६   क
उन्माद्यति स तु क्षिप्रं तं तु देवग्रहं विदुः ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति