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शान्ति पर्व
अध्याय २१८
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शक्र उवाच
भूमिरेव मनुष्येषु धारणी भूतभाविनी |  २१   क
सा ते पादं तितिक्षेत समर्था हीति मे मतिः ||  २१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति