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आदि पर्व
अध्याय २१८
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वैशम्पाय़न उवाच
प्रगृह्य परिघं घोरं विचचारार्यमा अपि |  ३४   क
मित्रश्च क्षुरपर्यन्तं चक्रं गृह्य व्यतिष्ठत ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति