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वन पर्व
अध्याय २१७
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मार्कण्डेय़ उवाच
रुद्रमग्निमुमां स्वाहां प्रदेशेषु महावलाम् |  ५   क
यजन्ति पुत्रकामाश्च पुत्रिणश्च सदा जनाः ||  ५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति