आदि पर्व  अध्याय २१४

वैशम्पाय़न उवाच

स समं धर्मकामार्थान्सिषेवे भरतर्षभः |  ३   क
त्रीनिवात्मसमान्वन्धून्वन्धुमानिव मानय़न् ||  ३   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति