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आदि पर्व
अध्याय २१४
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वैशम्पाय़न उवाच
न तु केवलदैवेन प्रजा भावेन रेमिरे |  १०   क
यद्वभूव मनःकान्तं कर्मणा स चकार तत् ||  १०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति