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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
पुरन्दरस्तु तामाह मा भैर्नास्ति भय़ं तव |  ८   क
एवमुक्त्वा ततोऽपश्यत्केशिनं स्थितमग्रतः ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति