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वन पर्व
अध्याय २१३
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मार्कण्डेय़ उवाच
भृगुभिश्चाङ्गिरोभिश्च हुतं मन्त्रैः पृथग्विधैः |  २९   क
हव्यं गृहीत्वा वह्निं च प्रविशन्तं दिवाकरम् ||  २९   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति