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शान्ति पर्व
अध्याय २११
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भीष्म उवाच
विनाशिनो ह्यध्रुवजीवितस्य; किं वन्धुभिर्मित्रपरिग्रहैश्च |  ४६   क
विहाय़ यो गच्छति सर्वमेव; क्षणेन गत्वा न निवर्तते च ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति