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वन पर्व
अध्याय २१०
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मार्कण्डेय़ उवाच
रथन्तरश्च तपसः पुत्रोऽग्निः परिपठ्यते |  १९   क
मित्रविन्दाय़ वै तस्य हविरध्वर्यवो विदुः |  १९   ख
मुमुदे परमप्रीतः सह पुत्रैर्महाय़शाः ||  १९   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति