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वन पर्व
अध्याय २१०
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मार्कण्डेय़ उवाच
चितोऽग्निरुद्वहन्यज्ञं पक्षाभ्यां तान्प्रवाधते |  १७   क
मन्त्रैः प्रशमिता ह्येते नेष्टं मुष्णन्ति यज्ञिय़म् ||  १७   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति