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विराट पर्व
अध्याय २१
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भीमसेन उवाच
दिष्ट्या त्वं दर्शनीय़ोऽसि दिष्ट्यात्मानं प्रशंससि |  ४६   क
ईदृशस्तु त्वय़ा स्पर्शः स्पृष्टपूर्वो न कर्हिचित् ||  ४६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति