वन पर्व  अध्याय २१

वासुदेव उवाच

स चापि पापप्रकृतिर्दैतेय़ापसदो नृप |  १९   क
मय़्यवर्षत दुर्धर्षः शरधाराः सहस्रशः ||  १९   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति