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शान्ति पर्व
अध्याय २०९
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गुरुरु उवाच
सत्त्वं रजस्तमश्चेति देवासुरगुणान्विदुः |  १८   क
सत्त्वं देवगुणं विद्यादितरावासुरौ गुणौ ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति