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वन पर्व
अध्याय २०५
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व्याध उवाच
मन्वानस्तं मृगं चाहं सम्प्राप्तः सहसा मुनिम् |  २७   क
अपश्यं तमृषिं विद्धं शरेणानतपर्वणा |  २७   ख
तमुग्रतपसं विप्रं निष्टनन्तं महीतले ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति