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शान्ति पर्व
अध्याय २०५
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गुरुरु उवाच
संमोहकं तमो विद्यात्कृष्णमज्ञानसम्भवम् |  २१   क
प्रीतिदुःखनिवद्धांश्च समस्तांस्त्रीनथो गुणान् |  २१   ख
सत्त्वस्य रजसश्चैव तमसश्च निवोध तान् ||  २१   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति