आदि पर्व  अध्याय २०५

वैशम्पाय़न उवाच

ह्रिय़ते गोधनं क्षुद्रैर्नृशंसैरकृतात्मभिः |  ७   क
प्रसह्य वोऽस्माद्विषय़ादभिधावत पाण्डवाः ||  ७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति