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वन पर्व
अध्याय २०४
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मार्कण्डेय़ उवाच
एतेषु यस्तु वर्तेत सम्यगेव द्विजोत्तम |  २७   क
भवेय़ुरग्नय़स्तस्य परिचीर्णास्तु नित्यशः |  २७   ख
गार्हस्थ्ये वर्तमानस्य धर्म एष सनातनः ||  २७   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति