वन पर्व  अध्याय २०४

मार्कण्डेय़ उवाच

एतौ मे परमं व्रह्मन्पिता माता च दैवतम् |  २०   क
एतौ पुष्पैः फलै रत्नैस्तोषय़ामि सदा द्विज ||  २०   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति