वन पर्व  अध्याय २०३

व्याध उवाच

एवं त्विह स सर्वत्र प्राणेन परिपाल्यते |  १७   क
पृष्ठतस्तु समानेन स्वां स्वां गतिमुपाश्रितः ||  १७   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति