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अनुशासन पर्व
अध्याय २०
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भीष्म उवाच
तत्राश्रमपदं दिव्यं ददर्श भगवानथ |  ३२   क
शैलांश्च विविधाकारान्काञ्चनान्रत्नभूषितान् |  ३२   ख
मणिभूमौ निविष्टाश्च पुष्करिण्यस्तथैव च ||  ३२   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति