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शल्य पर्व
अध्याय २
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वैशम्पाय़न उवाच
दुःखेन महता राजा सन्तप्तो भरतर्षभ |  ५०   क
पुनर्गावल्गणिं सूतं पर्यपृच्छद्यथातथम् ||  ५०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति