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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
नेह ध्रुवं किञ्चन जातु विद्यते; अस्मिँल्लोके कर्मणोऽनित्ययोगात् |  ६   क
सूर्योदय़े को हि विमुक्तसंशय़ो; भावं कुर्वीताद्य महाव्रते हते ||  ६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति