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द्रोण पर्व
अध्याय २
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कर्ण उवाच
तपोऽभ्युदीर्णं तपसैव गम्यते; वलं वलेनापि तथा मनस्विभिः |  १८   क
मनश्च मे शत्रुनिवारणे ध्रुवं; स्वरक्षणे चाचलवद्व्यवस्थितम् ||  १८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति