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वन पर्व
अध्याय २
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शौनक उवाच
उत्तरो देवय़ानस्तु सद्भिराचरितः सदा |  ७३   क
अष्टाङ्गेनैव मार्गेण विशुद्धात्मा समाचरेत् ||  ७३   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति