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सौप्तिक पर्व
अध्याय २
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कृप उवाच
ते वय़ं धृतराष्ट्रं च गान्धारीं च समेत्य ह |  ३१   क
उपपृच्छामहे गत्वा विदुरं च महामतिम् ||  ३१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति