सौप्तिक पर्व  अध्याय २

कृप उवाच

एवमेतदनादृत्य वर्तते यस्त्वतोऽन्यथा |  १८   क
स करोत्यात्मनोऽनर्थान्नैष वुद्धिमतां नय़ः ||  १८   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति