आदि पर्व  अध्याय २

सूत उवाच

कश्मलं यत्र पार्थस्य वासुदेवो महामतिः |  १५६   क
मोहजं नाशय़ामास हेतुभिर्मोक्षदर्शनैः ||  १५६   ख
अनुवाद

अकृत-अनुवादम्

टीका

टीका नास्ति