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वन पर्व
अध्याय १९९
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मार्कण्डेय़ उवाच
वक्तुं वहुविधं शक्यं धर्माधर्मेषु कर्मसु |  ३४   क
स्वकर्मनिरतो यो हि स यशः प्राप्नुय़ान्महत् ||  ३४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति