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वन पर्व
अध्याय १९७
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मार्कण्डेय़ उवाच
देहीति याचमानो वै तिष्ठेत्युक्तः स्त्रिय़ा ततः |  ८   क
शौचं तु यावत्कुरुते भाजनस्य कुटुम्विनी ||  ८   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति