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वन पर्व
अध्याय १९६
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मार्कण्डेय़ उवाच
मातरं सदृशीं तात पितॄनन्ये च मन्यते |  १५   क
दुष्करं कुरुते माता विवर्धय़ति या प्रजाः ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति