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वन पर्व
अध्याय १९५
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मार्कण्डेय़ उवाच
मुखजेनाग्निना क्रुद्धो लोकानुद्वर्तय़न्निव |  २५   क
क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिलः प्रभुः |  २५   ख
सगरस्यात्मजान्क्रुद्धस्तदद्भुतमिवाभवत् ||  २५   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति