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शान्ति पर्व
अध्याय १९४
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मनुरु उवाच
कृत्स्नस्तु मन्त्रो विधिवत्प्रय़ुक्तो; यज्ञा यथोक्तास्त्वथ दक्षिणाश्च |  १५   क
अन्नप्रदानं मनसः समाधिः; पञ्चात्मकं कर्मफलं वदन्ति ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति