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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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व्राह्मण उवाच
युद्धं मम सदा वाणी याचतीति विकत्थसे |  ४४   क
न च युद्धं मय़ा सार्धं किमर्थं याचसे पुनः ||  ४४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति