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शान्ति पर्व
अध्याय १९२
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विकृत उवाच
मय़ास्य दत्तं राजर्षे गृह्णीय़ां तत्कथं पुनः |  १०१   क
काममत्रापराधो मे दण्ड्यमाज्ञापय़ प्रभो ||  १०१   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति