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आदि पर्व
अध्याय १९०
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द्रुपद उवाच
यदि वाय़ं विहितः शङ्करेण; धर्मोऽधर्मो वा नात्र ममापराधः |  ४   क
गृह्णन्त्विमे विधिवत्पाणिमस्या; यथोपजोषं विहितैषां हि कृष्णा ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति