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शल्य पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
तमास्थितो राजवरो वभूव; यथोदय़स्थः सविता क्षपान्ते |  ४   क
स तेन नागप्रवरेण राज; न्नभ्युद्ययौ पाण्डुसुतान्समन्तात् |  ४   ख
शितैः पृषत्कैर्विददार चापि; महेन्द्रवज्रप्रतिमैः सुघोरैः ||  ४   ग
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति