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द्रोण पर्व
अध्याय १९
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सञ्जय़ उवाच
विधाय़ योगं पार्थेन संशप्तकगणैः सह |  २   क
निष्क्रान्ते च रणात्पार्थे संशप्तकवधं प्रति ||  २   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति