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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
धर्मराजश्च पुत्रस्ते राज्यं प्राणान्धनानि च |  ४   क
अनुजानाति राजर्षे यच्चान्यदपि किञ्चन ||  ४   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति