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आश्रमवासिक पर्व
अध्याय १९
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वैशम्पाय़न उवाच
इत्युक्तो विदुरेणाथ धृतराष्ट्रोऽभिनन्द्य तत् |  १५   क
मनश्चक्रे महादाने कार्त्तिक्यां जनमेजय़ ||  १५   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति