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वन पर्व
अध्याय १८९
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वैशम्पाय़न उवाच
कस्मिन्धर्मे मय़ा स्थेय़ं प्रजाः संरक्षता मुने |  २०   क
कथं च वर्तमानो वै न च्यवेय़ं स्वधर्मतः ||  २०   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति