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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
ततः कालान्तरेऽन्यस्मिन्पुनर्लोकविवृद्धय़े |  ८६   क
भविष्यति पुनर्दैवमनुकूलं यदृच्छय़ा ||  ८६   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति