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वन पर्व
अध्याय १८८
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मार्कण्डेय़ उवाच
म्लेच्छाः क्रूराः सर्वभक्षा दारुणाः सर्वकर्मसु |  ५२   क
भाविनः पश्चिमे काले मनुष्या नात्र संशय़ः ||  ५२   ख
अनुवाद
अकृत-अनुवादम्
टीका
टीका नास्ति